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अस्तित्व / रामेश्वरलाल खंडेलवाल 'तरुण'

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मैं एक कुसुम उस जंगल का-
जिसमें खिलते अनगिनत कुसुम;
फलते हरियाले लतिका-द्रम;
यदि एक कुसुम चुपचाप झरे-
तो बोलो, उस रंगस्थल का-
क्या बनता और बिगड़ता है!

मैं एक नखत अम्बरतल का-
जिसमें बिखरे हैं ज्योति-भरे-
हीरे-मोती के सौ गजरे;
यदि एक सितारा टूट गिरे-
तो बोलो, उस नीलांचल का-
क्या बनता और बिगड़ता है!

मैं दीपक उस दीपावली का-
जिसमें जल उठते मधुर-मधुर,
लाखों मृदु दीपक जगर-मगर;
यदि एक गली का दीप बुझे-
तो स्वर्ण-प्रभा के मण्डल का-
क्या बनता और बिगड़ता है!

मैं बुद्बुद उस संगम-स्थल का-
जिसमें बल-खाती धाराएँ,
आ मिलतीं फैलाकर बाँहे;
यदि बुद्बुद एक वहाँ फूटै-
तो बोलो, उस निस्तल जल का-
क्या बनता और बिगड़ता!