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अस्तित्व / ललितेश मिश्र

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अस्तित्वक नाम पर हमरा लोकनिक
जीहसँ कण्ठनलिकाक माध्यमे
संयुक्त अमाशय-पक्वशय टा धरि
निरापद बाँचल अछि
धमनी, शिरा, आ मस्तिष्क पर
जेना बर्फक हिमालय
जमि गेल अछि-अपरा भेदी !
विस्मित हमर मोन-प्राण
बूझए चाहैछ
जँ कष्ट-भोगक प्रारब्ध समतुल्य अछि
तँ देह आ आदर्शक व्यापारमे
कोनो विभेद नहि ?
एहि वैविध्यपूर्ण संसारक
नाटक लीलामे
सरिपहुँ पात्र-उपपात्र बनल
मुनक्खक लेल
निष्कर्ष प्राप्तिक अनिश्चिततासँ
पैघ कोनो विरोधाभास नहि
नापल-जोखल जीवनक
इएह अनिर्णयात्मकता तँ
भेल हमर अस्तित्व !