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अहम् कालोस्मि / ईहातीत क्षण / मृदुल कीर्ति

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जीवन के आर और ,जीवन के पार भी,

मृत्यु के आर और मृत्यु के पार भी

आयु के आर पार मध्य समय हमारे साथ चलता है.

हम समय की उंगली थाम कर ही,

आते है, रहतें है, जाते है,

जब सब साथ छोड़ देते हैं

तब केवल समय ही हमारा साथ देता है.

समय की अनाहत धारा अनवरत गतिमान है,

सबका ममकार ,सबका परिग्रह ,

सबका यौवन , सबका सौंदर्य ,

सारे साम्राज्य , सारे भूगोल , सारे इतिहास

इसमें बह जाते हैं,

समय फ़िर भी शेष है.

सृष्टि, ब्रह्माण्ड ,इतिहास, भूगोल, खगोल का,

स्वयं दृष्टा, एकमात्र स्वयं साक्षी .

सृष्टा ब्रह्म भी कदाचित

समय की आंखों से ही देखता है ,

तब ही अहम् कालोस्मि का उद्घोष

तथाकथित रूपों में से एक ,

स्वयम को घोषित करता है.


रूप की इयत्ता का बंदी

जिस सौंदर्य पर तुमने अपने भावों का अंकन किया ,

मूल्यांकन किया ,

उसे अपनी ही आग में तप कर ,

अपनी अस्मिता सिद्ध करनी है.

इस सौन्दर्य को पार्थिव में सहेजा नहीं जा सकता .

सहा नहीं जा सकता ,कहा नहीं जा सकता.

मेरे रूप की इयत्ता के बंदी,

में तुम्हारे पुद्गल पुरुषार्थ की शर्त हो रही हूँ.

क्योंकि तुम मेरे मन के ,

उस स्वर को छूते हो,

जिसको किसी पर व्यक्त नहीं किया जा सकता है.