भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अहे मोरा पिछुअड़ा लवँगिया के गछिया / मगही

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

अहे मोरा पिछुअड़ा[1] लवँगिया के गछिया[2]
लवँग चुअले[3] सारी रात हे।
अहे लवँग चुनि चुनि सेजिया डँसवलों।
बीचे बीचे रेसम के डोरा हे॥1॥
अहे ताहि पइसि[4] सुतले, दुलहा कवन दुलहा।
जउरे सजनवा केरा धिया हे।
अहे ओते ओते[5] सुतहु कवन सुगइ।
तोरा गरमी मोरा ना सोहाय हे॥2॥
अहे अतिना[6] बचनियाँ जब सुनत कवन सुगइ।
रोअत नइहरवा चलि जाय हे।
अहे मोरा पिछुअड़वा मलहवा रे भइया।
मोहि के[7] पार उतारऽ हे॥3॥
अहे राति अमल[8] बहिनी अतही[9] गँवावऽ[10]
भोरे[11] उतारब पार हे॥4॥
अहे भला जनि बोलइ भइया, मलहवा भइया।
तोरो बोली मोहिं न सोहाय हे।
अहे चान[12] सुरुज अइसन अपन परभु तेजलों[13]
तोहरो के सँग नहीं जायब हे॥5॥
अहे एके नइया आवले लवँग इलाइची।
दोसरे नइया आवे पाकल पान हे।
अहे तीसरे नइया आवलें ओहे पनखउका[14]
उनके साथ उतरव पार हे॥6॥

शब्दार्थ
  1. पीछे, पिछवाड़े, मकान के पिछले भाग में
  2. गाछ, पेड़
  3. चूता है
  4. प्रवेश करके
  5. अलग हटकर, उधर
  6. इतना
  7. मुझे
  8. समय
  9. यहीं
  10. बिताओ, व्यतीत करो
  11. सवेरे
  12. चंद्रमा
  13. त्याग दिया
  14. पान खाने वाला, यहाँ उसके पति से तात्पर्य है