आँख से बहते सपने / बाल गंगाधर 'बागी'

उनके आँख से सपने हजार बहते हैं
जो भूखे प्यासे, अक्सर तड़पते रहते हैं

चैन की सांसें जहाँ रह-रह के सुलगती हैं
भूख तन्हाईयों से ऐसी बातें करती है
हर मौसम पतझड़ जहाँ का लगता है
सारी बहारे जहाँ अक्सर रोती रहती हैं

जहाँ गोद में किलकारियाँ तड़पती हैं
बिना तेल के चिराग जैसे जलती हैं

दरो दीवार हैं उजड़े आसमानों में
खुशी के गीत नहीं हैं जहाँ मकानों में
रेगिस्तान सा जहाँ विरान मंजर है
जहाँ उम्मीद हर धंसी है निगाहों में

वहाँ ख्वाब में भी रौशनी नहीं होती
जहाँ शमां हकीकत में नहीं जलती

ठंडी राख में दबी हुई चिन्गारी है
शायद ज्वाला में ढलने की तैयारी हे
जहाँ दिन में फ़िजायें अक्सर रोती हैं
वहाँ सुबह किस दहलीज तक पहुंचती है

उनके आँख से सपने हजार बहते हैं
जो भूखे प्यासे अक्सर तड़पते रहते हैं

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