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आइने पर आइने पर चोट की / वीरेन्द्र कुमार जैन

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आइने ने आइने पर चोट की,
आप ही तड़ककर तिलमिला उठा :
दूसरा आईना तो कहीं था ही नहीं ।
एक निस्तब्ध शून्य में
तैरने लगा आईना...
पाया कि
यह दरार नहीं, प्रकाश की लकीर है :
अब तक वह औरों को ही उनके मुँह दिखा रहा था,
आज अपने में पहली बार, उसने अपना मुँह देखा :
...अपने सौन्दर्य को देखकर
वह चूर-चूर हो गया...
उसके हृदय में जो हुआ विस्फ़ोट -
वह उसका नवजन्म था।
तट पर कोई नहीं था,
एक नदी अपने ही आपको देखती हुई
बही जा रही थी... बही जा रही थी!