भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आई गैन रितु बौड़ी, दाँई जसो फेरो / गढ़वाली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

आई गैन रितु बौड़ी, दाँई[1] जसो फेरो[2],
फूली गैन बण बीच, ग्वीराल बुराँस!
झपन्याली[3] डाल्यों मा, घूघती[4] धूरली,
गैरी-गैरी[5] मा, म्योलड़ी बोलली
उचि उचि डाँड्यों मा, कफू वासलो।
मौलली भाँति भाँति की फुलेर डाले!
गेऊँ-जौ की सारी[6], सैरीं[7] पिंगली ह्वैन,
राडा की रडवाड़ियों मा, मारी रुणाली!
डाँडी काँठी गूँज, ग्वेरू की मुरल्योंन[8],
गौं की नौनी स्ये, गीत वसंती गाली।
जौं की ब्वई[9] होली, मैतुड़ा[10] बुलाली,
मेरी जिकुड़ी मा ब्वै, कुयेड़ी-सी लौंकी।

शब्दार्थ
  1. लौट
  2. चक्कर
  3. हरी-भरी
  4. फाखता
  5. गहरी
  6. खेत
  7. सरसों
  8. बांसुरी
  9. माँ
  10. मायके