भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आएँ नहीं जाएँ, प्राण करें धुक-धुक / जयप्रकाश त्रिपाठी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उँगली में पोर-पोर नाधे सुख-दुख।
बित्ताभर जीवन के रोज़ नए रुख।

खोज-खोज राह थके, ठाँव-ठौर गुम,
कोई कहे चलता चल, कोई कहे रुक।

चूल्हा-चक्की लादे डगर-मगर पाँव,
आएँ-नहीं-जाएँ प्राण करें धुक-धुक।

सीना ताने क्यों, फैले दोनो हाथ,
चाहे तो रीढ़ बिना और जरा झुक।

सौ-सौ अनर्थ लिए एक-एक अर्थ,
तितर-बितर शब्द हुए, मिलें नहीं तुक।