भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आए दौरि पौरि लौं अबाई सुन ऊधव की / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आए दौरि पौरि लौं अबाई सुन ऊधव की
और ही विलोकि दसा दृग भरि लेत हैं ।
कहै रतनाकर बिलोकि बिलखात उन्हैं
येऊ कर काँपत करेजै धरि लेत हैं ॥
आवंति कछूक पूछिबे और कहिबे की मन
परत न साहस पै दोऊ दरि लेत हैं ।
आनन उदास सांस भरि उकसौहैं करि
सौहैं करि नैननि निचौहैं करि लेत हैं ॥106॥