भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

आए भुजबंध दये ऊधव सखा कैं कंध / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आए भुजबंध दये ऊधव सखा कैं कंध
डग-मग पाय मग धरत धराये हैं ।
कहै रतनाकर न बूझैं कछु बोलत औ,
खोलत न नैन हूँ अचैन चित छाए हैं ॥
पाइ बहै कंच मैं सुगंध राधिका को मंजु
ध्याए कदली-बन मतंग लौ मताये हैं।
कान्ह गये जमुना नहान पै नए सिर सौं
नीकै तहाँ नेह का नदी मैं न्हाइ आए हैं ॥२॥