भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आओ तुमको गीत सुनाएँ / प्रदीप शुक्ल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उठो अकविता के मरुथल से
तुमको शीतल छाँव दिखाएँ
आओ तुमको गीत सुनाएँ

शब्दों की
खुरदुरी सतह पर
चलते चलते थक जाओगे
मृग मरीचिका के पीछे तुम
कब तक मन को दौड़ाओगे
लय में बहते निर्झर जल से
आओ मन की प्यास बुझाएँ
आओ तुमको गीत सुनाएँ

पछुआ की
बेरहम हवाएँ
सुखा रहीं मन का गीलापन
पुरवा के आँचल में खोजें
आओ थोड़ा सा अपनापन
सुधियों के
मृगछौने लेकर
बैठ छाँव में हम दुलराएँ
आओ तुमको गीत सुनाएँ