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आगम सुन्यौ है प्राण प्यारे कौ / चतुर्भुज पाठक 'कञ्ज'

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आगम सुन्यौ है प्राण प्यारे कौ प्रभात आज
धाउ बेगि न्हायबे कों मत कर मौज हैं
कहै कवि 'कंज' अंग-अंग हरसाने और
हीय अभिलासन के बढ़त सु ओज हैं
बसन उतार नीर तीर के तमाल तरें
सुपरि लपेटी जंघ आनंद के चोज हैं
कंचुकी बिना ही जब ताल में धँसी है बाल
देख कें उरोज हाथ मलत सरोज हैं