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आज़ादी की स्वर्ण जयन्ती / राम सेंगर

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अन्धा पीसे
कुत्ता खाए ।

देह धरे का स्वाँग निराला
हर बन्दर के हाथ आइना
शठ धारे हैं कण्ठी-माला
माँगे कौन कैफ़ियत किससे
किसका पर्दा कौन उठाए ।

चोरों की दाढ़ी में तिनके
छायाँकित अपराध ढबों पर
नकली चेहरे, उनके-इनके
बुद्धि-भावना की न लड़ाई
बेमतलब के किले बनाए ।

बातें कोरी यहाँ-वहाँ की
संशय के कीड़ों ने शायद
रगड़ नहीं देखी पनहा की
जीभ दोगली, हाथ दोगले
कीर्तिमान क्या ख़ूब बनाए ।

ब्याह ऊँट का, गधे गवैये
ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे
पचकल्याण-भाँड़-नचकैये
लूट रहे हैं सुघड़बड़ाई
किया धरा कुछ नज़र न आए ।

खुलेआम कम तोले बनिया
लूट सके सो लूट मची है
कहे-सुने किससे रमधनिया
घुग्घू हों या घाघ मँच पर
सब धन्नासेठों के जाए ।

है मज़ाक कितना यह गन्दा
जिसको देखो फूल रहा है
खा-खाकर जनहित का चन्दा
चरागाह है देश समूचा
हैं स्वच्छन्द यहाँ चौपाये ।

मुँह के आगे दिखे न खाई
बेलगाम हैं शब्द-बछेड़े
रोके उसकी शामत आई
झूठ कहे सो लड्डू खाए
साँच कहे सो मारा जाए ।

परम्परा की निर्मल धारा
सूख रही है धीरे-धीरे
नहीं उठ रही लहर दोबारा
सम्वेदन का बना मलीदा
दिन लग रहे ताप के ताए ।

सदाशयी व्यवहार कपट के
दीख रहे हैं जिजीविषा पर
मण्डराते बादल सँकट के
आग बचा कर रखें, सफ़र में,
कब कैसा क्या मौक़ा आए ।

अन्धा पीसे
कुत्ता खाए ।