भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

आज़ादी / उर्मिल सत्यभूषण

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

इक खुशबू का नाम है, आज़ादी प्रकाश
उछल उछल भुज पाश में भर ले तू आकाश

पवन आज़ाद डोलती, मन की खिड़की खोल
जनगण मन के साथ तू, भारत की जय बोल

आज़ादी का मोल है-प्राण, न जाना भूल
लोहे के शूलों घिरे, आज़ादी के फूल

रोपे थे जब बीज ये, बीत गये कुछ साल
आज़ादी बिरवा लगा, माली तू संभाल

दुश्मन घर बाहर खड़े, आक्रामक गद्दार
सावधान सबको करे, परचम पहरेदार

सोये प्रहरी देश के, देखो इनके ठाठ
चाट रहीं हैं दीमकें, देश द्वार के काठ

राजनीति के पेड़ की, डाल-डाल पे उलूक
बैठे, ताने हर तरफ, साजिश की बंदूक

अपने हित के हेतु जो दें राष्ट्र को तोड़
ऐसे सपने देखती, आंखों को ही फोड़

याद रहे कर्त्तव्य भी, अधिकारों के साथ
संकल्पों का पर्व है, चलो उठाओ हाथ

बुझने हम देंगे नहीं, हो आंधी-बरसात
आज़ादी का दीप यह, जले सदा दिन-रात

माटी मेरे देश की तेरा मेरा साथ
नित नित तुझको नमन, मैं, करूँ लगाऊँ माथ।