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आजु चतुरथी करहो बर, भेलै भिनसर हे / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

विवाह-संस्कार संपन्न होने के चौथे दिन ‘चतुर्थी’ की विधि संपन्न की जातीत है। इस विधि में वर-वधू को पालो पर खड़ा कर स्नान कराया जाता है तथा दोनों के हाथ के कंगन खोले जाते हैं।

प्रस्तुत गीत में इस विधि को विधि-विधानपूर्वक संपन्न करने का उल्लेख है।

आजु चतुरथी[1] करहो बर, भेलै भिनसर हे।
बिधिकरी[2] सेज उठाय, कोहबर निपाओल हे॥1॥
कामिनी सिनुरा छारल, बिधिकरि झारल हे।
हाथ धरि लेल सुकुमार, चलल बर बाहर हे॥2॥
जुगुति सेॅ पालऽ[3] बैठाओल, बैठाइ नहाओल हे।
हाथ धरि लेल बर पान, चलल बर कोहबर हे॥3॥
कोहबर जाय बर होम करऽ, दुलहिन घुँघट काढू हे।
आम के पल्लब लै बान्हल, खोलु बर कँगन हे॥4॥

शब्दार्थ
  1. विवाह के चौथे दिन होने वाली एक विधि जिसमें वर-वधू को स्नान कराया जाता है
  2. विवाह में लौकिक विधि संपन्न कराने वाली स्त्री
  3. हल के बैलों को जोतते समय उनके कंधे पर रखा जाने वाला लकड़ी का जुआ। चतुर्थी के दिन वर-वधू को पाली पर खड़ा करके स्नान कराने की एक लौकिक विधि। पालो पालि, फलक, फाल