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आज दिल फिर शाद के फूलों से नहाया है / हरकीरत हकीर

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आज दिल फिर शाद के फूलों से नहाया है
ख़ुशबू का इक मंज़र तेरी याद बन आया है

मैंने भेजे थे कुछ पैगाम पीपल के पत्तों पर
बादल भीगी पलकों से उनके जवाब लाया है

मुआहिदा[1] किया जब-जब तेरा हवाओं से
दुपट्टा हया का आँखों तक सरक आया है

महजूज़[2] है, ममनून[3] है दिल का परिंदा
नगमा मोहब्बत का लबों पे उतर आया है

अय खुश्क लम्हों चलना जरा किनारे से
हीर की मजार पे सुर्ख़ फूल खिल आया है

शब्दार्थ
  1. ज़िक्र
  2. आनंदित
  3. आभारी