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आज धनखेती में / रवीन्द्रनाथ ठाकुर / सिपाही सिंह ‘श्रीमंत’

आज धनखेती में
धूप छाहीं के
लूका चोरी खेल चल रहल बा।
नील आसमान में
ऊजर मेघ के नाव
के भसा देले बा
आज भौंरा
भुला गइल बा
मधु पीअल
मताल लेखा
उड़ रह बा
तहरा प्रकाश-किरण में।
आज नदी किनारे
चकवा-चकई
काहे खातिर आइल बा?
काहे खातिर चराउर कर रहल बा?
अरे भाई रे भाई
आज ना जाएब हम घरे
ना जाएब हम घरे।
आज हम,
आकाश में छेद क के
छितराइल वैभव के
लूट करेब, लूट लेब।
आज समुंदर के
ज्वार-जल में

फेन-पर-फेन बना के
हवा ठठा के हँस रहल बा।
आज बिना काम-काज के
बे-बात के बात,
बंसी बजावत
सउँसे दिन काट लेब।