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आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए / शाहिद कबीर

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आज हम बिछड़े हैं तो कितने रंगीले हो गए
मेरी आंखें सुर्ख़ तेरे हाथ पीले हो गए

कब की पत्थर हो चुकी थीं, मुंतज़िर आँखें मगर
छू के जब देखा तो मेरे हाथ गीले हो गए

जाने क्या एहसास साज़-ए-हुस्न के तारों में है
जिनको छूते ही मेरे नग़मे रसीले हो गए

अब कोई उम्मीद है 'शाहिद' न कोई आरज़ू
आसरे टूटे तो जीने के वसीले हो गए