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आत्मदान / जगन्नाथप्रसाद 'मिलिंद'

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सुरभित श्वासों में मर्म-दंश, मृदु चरणों में निष्ठुर प्रयाण,
अधरों में मदिरा तीव्र और नयनों में ले विष-बुझे बाण,
ढक कोमल-कर के स्वर्णपात्र में भरे हलाहल पर अंचल,
सुंदरते, जग-आँगन में आ, कर दिए मनुज तुमने चंचल।
अगणित उत्कंठित हृदयों ने विष छीन-छीनकर पान किया,
कर रिक्त तुम्हारा पात्र, मरण को, हाय, समझ वरदान लिया।
मर्त्यों को कब सर्वस्वार्पण-मद के रहस्य का पार मिला?
तुम बढ़ती गईं, विरक्तों की कुटिया का आगे द्वार मिला।
मदिरा, निष्ठुरता, बाण, दंश, तुमने दे उन्हें समाप्त किए;
कर प्रायश्चित, उनको ठुकरा, उन सबने तुमको शाप दिए।
था शेष तुम्हारे प्राणों में जो छिपा हुआ उपहार एक,
वह प्रेम-रत्न भी, निर्मोही, ले गए लूट, प्रेमी अनेक।

अब अनाभरण, अकलुष, अशस्त्र थीं तुम, सूनी थी पथ-रेखा;
कल्याणि, जगाते अलख विजन में तब तुमने कवि को देखा।
क्या देतीं? कब चिंता करतीं? था याचक इधर अधीर, प्रिये;
बस गईं हृदय में तुम कवि के बन स्वयं अमिट तस्वीर, प्रिये!