आत्मा होना चाहती थी एक तारा
पर तब नहीं जब अर्द्धरात्रि के आकाश से
सोए हुए इहलौकिक संसार की ओर
झाँकते हैं सजग आँखों की तरह प्रकाश-पुंज,
बल्कि तब, दोपहर में जब सूर्य की दहकती किरणों के
जैसे धुएँ के पीछे छिप जाते हैं वे,
देवताओं की तरह और अधिक उज्ज्वल
चमकते हैं निर्मल आकाश में ।
(1836)