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आत्म-विज्ञान (भजन) / अछूतानन्दजी 'हरिहर'

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था हमको नहिं यह ज्ञान, आदि-मत हिंद-निवासी थे। टेक
विद्या से पता लगाया, गुरुता गौरव दर्शाया।
सब दूर हुआ अज्ञान, भुला रहे सत्यानासी थे॥
लिख दी झूठी बदनामी, हा! संकर-बरन हरामी।
रच-रच के कथा पुराण, बनाये दासो-दासी थी॥
जन्मे शूद्र-योनि में आकर, पूर्व के फलों को पाकर।
कहें हुक्म दिया भगवान, किये यों अँध विश्वासी थे॥
जब जीव अनादि बताया, फिर कौन कर्म फल पाया।
तब आदि सृष्टि दरम्यान, न देह कर्मेन्द्रिय वासी थे॥
ईश्वर-अंश जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी.
सब वेद-शास्त्र यों कहें, व्यास वेदांत-विकासी थे॥
बिन देह कर्म नहीं होगा, फिर कहाँ कर्म का भोगा।
क्यों जन्मे नीच घर आन, जीव 'हरिहर' अनिवासी थे॥