भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

आत्म प्रचार-1 / नवारुण भट्टाचार्य / मीता दास

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं एक पेपर बैक किताब
नहीं होना चाहता
कि पढ़ लिए जाने के बाद फेंक दिया जाऊँ
और मेरे पृष्ठ भी
खुल-खुल कर अलग हो जाएँ ।

हार्ड बाउण्ड वाली
क़ीमती किताब भी नहीं होना चाहता मैं
जो ताक के ऊपर रखी रहती है
महीन धूल और कीड़ों के संग

इनमे से किसी भी एक की तरह
होने की इच्छा नहीं है मेरी
मेरी इच्छा है की मुझे
बचपन में सुने दोहे के रूप में याद रखा जाए

या फिर
ग़ैर-कानूनी इश्तेहार की तरह
चीत्कार कर उठूँ

मैं चाहता हूँ
मुझे सहज ही लो
जिस तरह दुःख को
तुम लोगों ने मान लिया है ।

मूल बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद : मीता दास