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आदिवंशी बसन्त / अछूतानन्दजी 'हरिहर'

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अब आदिवंश खेलहु बसंत, सब संत करहु दासता अंत॥
है आदिवंश का आदि-धर्म, तजि आत्म-अनुभवी ज्ञान-मर्म।
हो दास दिमागी, शोक! शर्म! क्यों बने अज्ञ सर्वज्ञ संत॥
जग में जो जारी है प्रपंच, तिन मेटन हित दें ध्यान रंच।
जग स्वर्ग बना बनिए विरंच, दल दुख दारिद दासत्व हंत॥
पारख-पद अनुभव ज्ञान-धार, नाशक कुताप त्रय तत्व सार।
आत्मिक, लौकिक, दैहिक सुधार, करिये प्रचार सतमत महन्त॥
भव भ्रमहि भुलाये भई हानि, विषबेलि बोइये द्विजन पानि।
रोचक, अंधक, भयदाय वाणि, संशोधि यथारथ करहु अंत॥