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आबला-पा / अली सरदार जाफ़री

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आबला-पा
काँटों की ज़बाँ सूख गई प्यास से या रब
इक आबला-पा वादि-ए-पुरख़ार में आवे
                           -ग़ालिब

साये में दरख़्तों के
बैठे हुए इन्सानों
ऐ वक़्त के मेहमानों
किस देस से आये हो
किस देस को जाना है
ऐ सोख़्ता-सामानों

ये वुस्‌अते-मैदाँ है
या दर्द का सहरा है
इक धूप का जंगल है
या प्यास का दरिया है
दरिया के परे क्या है
पत्थर है कि चश्मा है
नग़्मा है कि नालः है
शबनम है कि शो’ला है
शायद कोई साहिर है
जो डूबते सूरज के
दरवाज़े पे बैठा है
अफ़्सूने-तमाशा है



है रात की राहों मे
तारों का सफ़र जारी
और बादे-बियाबानी
सरमस्तो-ग़ज़ल-ख़्वाँ है
हर ज़र्रे के सीने में
इक शम्‌अ फ़ुरोज़ाँ है
हर खा़र के नेज़े पर
ख़्वाबों का गुलिस्ताँ है



ऐ इश्क़ जुनूँ-पेशा
उस सिम्त ही चलना है
डूबा है जहाँ सूरज
वाँ रेत के टीले पर
या नाकः ए-लैला है
या महमिले-सलमा है



सद-क़ाफ़िला पिन्हाँ है
सद-क़ाफ़िला पैदा है
आवाज़े-जरस[1] लेकिन
इस दश्त में तन्हा है
सदियों से इसी सूरत
है हुक़्मे-सफ़र जारी
फ़र्माने-सितम जारी
एलाने-करम जारी



फूलों के कटोरों में
शबनम की गुलाबी[2] है
और बादे-सहरगाही
बदमस्त शराबी है
कल सुबह के दामन में
तुम होंगे न हम होंगे
बस रेत के सीने पर
कुछ नक़्शे-क़दम होंगे
साये में दरख़्तों के
फिर लोग बहम होंगे

किस देस से आये हो
किस देस को जाना है
ऐ वक़्त के मेहमानो
ऐ शमे-तमन्ना पर
जलते हुए परवानो
ऐ सोख़्ता-सामानो!

शब्दार्थ
  1. घण्टे की आवाज़
  2. नोटः गुलाबी उस पात्र को कहते हैं जिसमें शराब रखी जाती है- मैंने शराब के अर्थ में प्रयोग किया है।