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आबहो बाभन पडित / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

घिउढारी की विधि में गौरी-गणेश तथा सप्तमातृकाओं की पूजा करके सात कुश-पिंजुलियों पर अथवा नये पीढ़े पर सात सिंदूर की लंबी पंक्ति बनाकर वर या वधू के माता-पिता द्वारा मंत्रपूर्वक घृत-धारा गिराई जाती है। यह धारा गृहदेवता के पास, गृहदेवता के घर के बाहर औरमंडप में गिराई जाती है। इसे संस्कार पद्धति में ‘वसोधारा’ कहते हें। लेकिन, लौकिक तथा शास्त्रीय विधि में स्थानभेद के कारण कुछ अंतर भी पड़ता है। इस विधि को संपन्न करने में दुलहे या दुलहिन के मामा का रहना अनिवार्य होता है।
इस गीत में मामा से विरोध के कारण उसे यज्ञ के अवसर पर निमंत्रित नहीं किया जाता। लेकिन, निश्चित समय पर मामा आ जाता है। लड़की की माँ सारा विरोध भूलकर अपने भाई को आँचल पर बैठाने को तैयार हो जाती है। भाई अपनी बहन से सारा विरोध त्यागने का अनुरोध करता है।

आबहो[1] बाभन पंडित, कि दिनमा[2] गुयि[3] देहो हे।
मोर घर होयत परोजन[4] नैहर लोग हे।
सेहो सुनि राजा हाँसै[5], हँसी के बिहुँसै हे॥1॥
गया नेवतब गजाधर, औरो सिव संकर हे।
मेघ डमरू[6] राजा छतरी[7], भरथ नहिं नेवतब हे॥2॥
सेहो सुनि रानी हे कानै[8], कानि के हँकन[9] करै हे।
जनम जीवन मोरा बेरथ[10] होतऽ, भरथ नहिं आयत हे॥3॥
गया सेॅ आयल गजाधर, औरो सिव संकर हे।
दुअरहिं घोड़ा हिंहिआयल[11], भरथ भैया आयल हे॥4॥
अँगना बोहारतेॅ गे चेरिया, छोरू चेरिया बोढ़नी हे।
देखु गये दुअरा पर जाइ, घोड़ा हिंहिआयल हे।
भरथ भैया आयल, सहोदर भैया आयल हे॥5॥
कहाँ हम राखबै में सार भार[12], औरो पियरी साड़ी हे।
कहाँ में बैठैबै भरथ भैया, जहि सेॅ[13] रूसन[14] मोरा हे॥6॥
सिरा[15] आगु रखबै में सार भार, औरो पियरी साड़ी हे।
अँचरा बैठैबै भरथ भैया, जहि सेॅ रूसन मोरा हे॥7॥
खोलु खोलु बहिनी दछिन[16] चीर, पहिरु पियरी साड़ी हे।
छोड़ी देहो मन के बिरोध, कि भैया सेॅ मिलन करु हे॥8॥

शब्दार्थ
  1. आओ
  2. दिन; सुदिन;
  3. गणना
  4. यज्ञ; प्रयोजन
  5. हँसता है
  6. छत्रपति; बाँस की कमाचियों का बना बड़ा छाता; यहाँ ‘राजाओं में बड़े छत्र के समान’ से तात्पर्य है
  7. क्षत्रिय
  8. रोती है
  9. जार-बेजार होकर रोना; सिर धुनकर रोना
  10. व्यर्थ
  11. हिनहिनाया
  12. बहँगी पर लादकर लाया हुआ संदेश आदि
  13. जिससे
  14. रूठना
  15. गृहदेवता या कुलदेवता का स्थान
  16. दक्षिणी चीर; एक प्रकार की साड़ी