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आबे-हयात जाके किसू ने पिया तो क्या / शाह हातिम

आबे-हयात जाके किसू ने पिया तो क्या
मानिंदे ख़िज्र जग में अकेला जिया तो क्या

शीरी-लबाँ सों संग-दिलों को असर नहीं
फ़रहाद काम कोहनी का किया तो क्या

जलना लगन में शमा-सिफ़्त सख्त्त काम है
परवाना जूँ शिताब अबस जी दिया तो क्या

नासूर की सिफ़त है, न होगा कभी वो बंद
जर्राह ज़ख़्म इश्क़ का आकर सिया तो क्या

मुहताजगी सों मुझको नहीं एकदम फ़राग
हक़ ने जहाँ में नाम को ’हातिम’ किया तो क्या!


शब्दार्थ :
संग-दिल + पत्थर जैसा दिल रखने वाले
कोहनी = पहाड़ खोदना
शिताब = जल्दी
अबस = बेकार
फ़राग = छुटकारा