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आयो मैंना चैत को, हे दीखो हे राम / गढ़वाली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

आयो मैंना चैत को, हे दीखो[1] हे राम।
उठिक फुलारी झुसमुस[2], लगी गैना निज काम॥
मास आय वैशाख को, सुणली पतिव्रता खास।
ग्यूँ जौ का पूलों मुड़े, कमर पड़ी गये झास॥
आयो मैना जेठ को, भक्का[3] हैगे मौत।
स्वामिका नी होणते, समझि रयूं मैं मौत॥
मास पैलो बसगाल को, आयो अब आषाढ़।
मैं पापिणि झुरि-झुरि, मरो मास रयो न हाड़॥
मास दूसरो गसग्याल को, आयो अब घनघोर।
बादल कुयेड़ि झूकिगे, वर्षा लगि झकझौर॥
भादों मैना आइक, मन समझा यो भौत।
या स्वामी घर आवन, या प्रभु ह्वै जो मौत॥
आयो मास असूज को, बादल गैंन दूर।
साटी झंगोरे सब पक्यो, निम्बू पाक्याचूर॥
आई देवाली कातिकी, चढ़िगे घर घर तैक।
यूंदींनू बिन स्वामि को ज्यू क्या लगलो कैक॥
आय मास मंगसीर को, हे बहिनो हे राम।
पतिदेव की फिक्र मां रयो हाड़ ना चाम॥
पूष मास को ठण्ड बड़ी, धर धर काँपद गात।
कनि होली भग्यांनसीं, छनपति जौं का साथ॥
लाग्यो मैना मांघ को, ठण्ड आबिगे दूर।
पति का घर निहोणसे, ज्यू यो ह्वैगे चूर॥
फागुन मैना आइगे, हरि भरि गैन सार।
सैं पापिण तनि हीरयो यकुला[4] बांदर कि चार॥

शब्दार्थ
  1. बहन
  2. जल्दी
  3. गर्मी
  4. अकेला