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आर्ट्स फैकल्टी / अर्पण कुमार

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एक बड़ा सा समूह था
कुछ लोग मौक़े-बेमौक़े
खेमे बनाते चले गए
इस तरह छोटे-छोटे
कई उपसमूह हो गए

अब हमारा भी
एक उपसमूह है
लेकिन ठहरिए
यह अलगाव की नीयत से बना
कोई उप-समूह नहीं है
यह उसी बड़े से समूह का अवशेष है
जिसके कुछ लोग
किसी भी खेमे में नहीं गए।