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आलमारी में इत्मीनान से अख़बार बिछा कर / विपिनकुमार अग्रवाल

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आलमारी में इत्मीनान से अख़बार बिछा कर

चारों दीवालों पर टंगे कैलेंडरों में

वही साल, वही महीना, वही दिन और तारीख़ देख

ताज्जुब में डूबे हुए गोपीनाथ ने

सहसा आर्द्र होकर एक बार फिर

अपनी पत्नी को अंगीठी सुलगाते देखा

और सोचने लगा

किसने पहली बार बनाया

इन औरतों का तम्बू-सा साया

अगर कभी खुलकर यह पाल-सा फहराया

तो जहाज की तरह तैरेगी यह एशिया की काया

तरल हो उसका अपना ही तन बेरोक-टोक लहराया

अरे, सुबह-सुबह यह कैसा

कवियों-सा मन में ख़्याल आया !

यूँ ही छोटे-मोटे अनुभव हैं

ऊबड़-खाबड़ भाव हैं

वैसे मन लगाने को

तनिक पढ़ा-लिखा कहलाने को

यह कविता

यह उपन्यास है

तभी गोपीनाथ को याद आया

किसी का कहा कि संसार है माया

वह मन-ही-मन मुस्कराया

हवाई-चप्पल पहनी

आसपास से नाता तोड़ा

सबकी खै़र मांगता हुआ

बीच बाज़ार उतर आया ।


(रचनाकाल : 1965)