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आशा के उठते स्वर पर मैं / अज्ञेय

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आशा के उठते स्वर पर मैं मौन, प्राण, रह जाऊँ!
आशा, मधु, द्वार प्रणय का-इस से आगे क्या गाऊँ?

जीवन-भर धक्के खाये, आहत भी हुए विलम्बित;
पर दीप रहे यदि जलता तो शिखा क्यों न हो कम्पित?
विश्वात्मा ही यह जाने हम सुखी हुए या असफल;
मैं कहूँ कि यदि हम हारे-वह हार बड़ी है कोमल!
कर पार समुद्र जीवन का हम पीछे लौट न देखें
बढ़ते अनन्त तक जावें इस से गुरु क्या सुख लेखें!

आशा, मधु, द्वार प्रणय का-इस से आगे क्या गाऊँ?
आशा के उठते स्वर पर मैं मौन प्राण रह जाऊँ!

1936