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आश्वस्ति / वेणु गोपाल

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भावी जंगल और उसकी भयावनी
ताकत के बारे में सोचता हुआ
सुनसान मैदान में निपट अकेला
पेड़

मुस्कुराता है-खिलखिलाता है

और उसके आसपास उमड़ आई
नन्हें-नन्हें पौधों की बाढ़
नहीं समझ पाती
कि पेड़
अकेला पेड़
अपने अकेलेपन में
किस बात पे ख़ुश है- कि हँस रहा है?
वे नहीं जान पाते
कि पेड़ जानता है
कि वे / अपने नन्हेंपन में भी
मैदान के भविष्य हैं।