भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

आस्था / धर्मवीर भारती

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

रात:
पर मैं जी रहा हूँ निड़र
जैसे कमल
जैसे पंथ
जैसे सूर्य

क्योंकि
कल भी हम खिलेंगे
हम चलेंगे
हम उगेंगे

और वे सब साथ होंगे
आज जिनको रात नें भटका दिया है!