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इंक़लाब-ए-रूस / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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(रूसी क्रान्ति की 50 वीं वर्षगाँठ पर)

मुर्ग़े-बिस्मिल के मानिंद[1] शब तिलमिलाई
उफ़क-ता-उफ़क[2]
सुब्‍हे-महशर[3] की पहली किरन जगमगाई
तो तारीक आँखों से बोसीदा[4] पर्दे हटाए गए
दिल जलाए गए
तबक़-दर-तबक़[5]
आसमानों के दर
यूँ खुले हफ़्त अफ़लाक[6] आईना से हो गए
शर्क़ ता ग़र्ब[7] सब क़ैदख़ानों के दर
आज वा हो गए[8]
क़स्रे-जम्हूर[9] की तरहे-नौ[10] के लिए
आज नक़्शे-कुहन[11] सब मिटाए गए
सीना-ए-वक़्त से सारे ख़ूनी कफ़न
आज के दिन सलामत[12] उठाए गए
आज पा-ए-ग़ुलामाँ में ज़ंज़ीरे-पा[13]
ऐसी छनकी केः बाँगे-दिरा[14] बन गई
दस्ते-मज़लूम[15] में हथकड़ी की कड़ी
ऐसी चमकी केः तेग़े-क़ज़ा[16] बन गई

शब्दार्थ
  1. घायल परिंदे की तरह
  2. क्षितिज में
  3. प्रलय का सवेरा
  4. फटे-पुराने
  5. आसमानों में
  6. सात आसमान
  7. पूर्व से पश्चिम तक
  8. खुल गए
  9. जनतंत्र का महल
  10. नई व्यवस्था
  11. पुराने चिह्न
  12. सुरक्षित
  13. ग़ुलामों के पैरों में ज़ंजीर
  14. घंटे की आवाज़
  15. अत्याचार सहनेवाले का हाथ
  16. ्मौत की तलवार