इक गांव है ख़याल में मेरे बना हुआ
अपनी ज़मीन से ही में जबसे जुदा हुआ।
ख़ामोश पल सुकून के मिलते नहीं कहीं
माहौल आज कल का है बस चीख़ता हुआ।
जब मेरा घर लुटा तो सभी चुप खड़े रहे
अब खुद पे आ पड़ी तो कहें ये बुरा हुआ।
अपने ही कत्ल का मैं गुनहगार हो गया।
कहते हैं लोग हक़ में मेरे फैसला हुआ।
बाहर न आने देगा मेरे आंसुओं को 'ऋषि'
इक बांध ज़ब्त का है अभी तक बना हुआ।