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इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली-सी / ज़ेब गौरी

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इक पीली चमकीली चिड़िया काली आँख नशीली-सी ।
बैठी है दरिया के किनारे मेरी तरह अकेली-सी ।

जब मैं नशेब-ए-रंग-ओ-बू[1] में उतरा उसकी याद के साथ,
ओस में भीगी धूप लगी है नर्म हरी लचकीली-सी ।

किसको ख़बर मैं किस रस्ते की धूल बनूँ या फूल बनूँ,
क्या जाने क्या रंग दिखाए उसकी आँख पहेली-सी ।

तेज़ हवा की धार से कटकर क्या जाने कब गिर जाए,
लहराती है शाख़-ए-तमन्ना[2] कच्ची बेल चंबेली-सी ।

कम रौशन इक ख़्वाब आईना इक पीला मुरझाया फूल,
पसमंज़र[3] के सन्नाटे में एक नदी पथरीली-सी ।

धोका खाने वाले नहीं हम 'ज़ेब' तेरि इस सादगी का,
मतलब गहरी आँखों जैसा बातें खुली हथेली-सी ।

शब्दार्थ
  1. रंग और सगन्ध की गहराई में
  2. कामना की टहनी
  3. दृश्य के पीछे