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इच्छा / रोज़ा आउसलेण्डर
Kavita Kosh से
मैं सोचती हूँ
कितने सारे शब्द खो देते हैं हम ।
जब तक मेरी नज़र उन पर पड़े
वे इतने कम हो जाते हैं
इतने कम शब्द
साँस लेते हैं मेरे साथ ।
मुझे याद आते हैं
कुछ शब्द —
’हम’
’पहले से ही’
’साथ-साथ’
मैं बाँटना चाहती हूँ
उन्हें
तुम्हारे साथ ।
रूसी भाषा से अनिल जनविजय द्वारा अनूदित