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इतिहास बोध / संजय अलंग

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मेरे इतिहास में सभी लोग सम्मलित हो जाते हैं
इस इतिहास में युद्ध, धर्म, नफ़रत, गोली नहीं है
हाँ इसमें मर्सडीज़, तनिष्क़, कैवियारा भी नहीं है
पर यह अकेले राजा का इतिहास भी नहीं है
वह राजा, जिसका इतिहास सब लिख रहे हैं
उसके इतिहास में न मैं हूँ न तुम
बन और बिगड़ हम ही रहें हैं और
नाम बार-बार राजा का आ रहा है

इसमें न तो पगडंडी है, न बेर, न जंगल, न पानी, न औरतें
अवधि, वर्ष, काल, तलवार, युद्ध, सत्ता, इमारतें
और न जाने क्या-क्या तो भरा पड़ा है
न संवाद, न खेल, न तान, न मादर, न करमा, न बेटी
 
इतिहास में भी निर्मम अंक ही अंक और आँकड़े ही आँकड़े भरे हैं
साल, हत्या, युद्ध, विजयें गिनी जा रही हैं
कहीं-कहीं तो कब्रे भी
चमड़ी छिले तन और मन के साथ