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इधर क्या-क्या अजूबे हो रहे हैं / मदन मोहन दानिश

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इधर क्या-क्या अजूबे हो रहे हैं ।
मरीज़े-दिल भी अच्छे हो रहे हैं ।

अगर कुछ दिन से शिकवे रहे हैं,
समझिए क्या इशारे हो रहे हैं ।

मोहब्बत, रतजगे, आवारगी भी,
ज़रूरी काम सारे हो रहे हैं ।

न जाने कौनसा दुख रात को है,
बहुत मद्धम सितारे हो रहे हैं ।

ज़रा सी ज़िंदगी है, चार दिन की,
उसी में सब तमाशे हो रहे हैं ।

सदायें काश दे पाता मैं उसको,
उसे देखे ज़माने हो रहे हैं ।

कहीं दो हाथ उठे हैं दुआ को,
कहीं हालात अच्छे हो रहे हैं ।

कभी आँसू, कभी मुस्कान दानिश,
मोहब्बत है, करिश्मे हो रहे हैं ।