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इन कविताओं के बारे में (रमेश चन्द्र शाह) / कुमार सुरेश

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ज़िन्दगी की एक ही चीज़ से पैमाइश हो सकती है, सिर्फ ज़िन्दगी से’ इन कविताओं का कवि कहता है और सिर्फ़ कहता नहीं, वैसी पैमाइश करके ख़ुद भी दिखा देता है। ये कविताएँ एक साथ हमारे जाने-पहचाने जीवन की आलोचना भी हैं और उसके छुपे हुए मर्म का भरसक उद्‍घाटन भी । कवि की सहानुभूति का जीवन-भोग और जीवन-साखी का घेरा खासा बड़ा और समावेशी है। उसमे रोज़ अदालत के निष्फल चक्कर काटती औरत भी है और वह लड़की भी जो ज़िन्दा रहने के जाने कितने हुनर जानती है। कवि संवेदना के इस घेरे में ‘अपनी ज़रूरतों के आइने में हमारा अक्स’ देखने वाले विज्ञापनजीवी धन्धेबाज़ भी हैं, भोथरी संवेदना वाली लाइलाज ‘पुण्यात्मा भी हैं जिनके लिये सब ठीक-ठाक चल रहा है। यहाँ ‘कचरा बीनने वाला लड़का’ है, जिसके सपने में भी कभी कोई मौसम नहीं आता’ और कहीं मजदूरिन माँ का ‘भोलाशंकर’ भी । घर और बाहर की जीवन-लीला के वे सारे चित्र जो यूँ तो अति परिचय के कारण ही हम पर कोई छाप नहीं छोड़ते मगर कवि द्वारा नयी विकलता के साथ लक्षित किए जाने के फलस्वरूप् ही हमारी चेतना को गर्म सलाखों की तरह दाग जाते हैं। कुछ इस तरह कि हम चाहें तो भी उनसे पीछा नहीं छुड़ा सकते । क्या यह किसी कवि के कवि कर्म को सार्थक बनाने वाली ख़ूबी नहीं है?

किन्तु ज़िन्दगी की यह पैमाइश इकहरी इकरंगी या किसी साँचे में ढ़ली हुई नहीं है। उसकी दूसरी ख़ूबी यह है कि उसमें एक सहज बेध्यता और निष्कवच खुलापन है । एक सर्वथा संवेदनाविहीन ,मूल्य-भ्रष्ट और मूल्य-मूढ़ परिवेश के त्रासद ब्यौरों से पटी हुइ है इन कविताओं की दुनिया, किन्तु उनका अंकन और आकलन इतना तीख़ा, धारदार और विचलित कर देने वाला इसलिये भी हो जाता है कि कवि ‘क्या है’ के साथ ही ‘क्या हो सकता था,’ ‘क्या होना चाहिये ’ की भी पक्की पूरी पहचान से लैस है। यो ये कविताएँ आम आदमी के मुहावरे का प्रत्यक्ष वस्तुपाठ लगती हैं, किन्तु उनकी मार्मिकता का स्रोत किसी चालू यथार्थवाद की चहारदिवारी के भीतर नहीं , बल्कि कवि की उस तीक्ष्ण मूल्य-चेतना और चराचर निष्ठ मानवीय संवेदना में है, जो ‘समयातीतपूर्ण’ के साथ भी एक प्रखर संवेदात्मक संबंध कायम रखे हुए है। यह आम आदमी तमाम नकली ख़ासुलख़ासों की पोलपट्टी उधेड़ने में सक्षम है किन्तु वह परम्परा में रची-बसी लीला पुरूषोत्तम की स्मृति से भी अनुप्राणित है और उससे भी अपने जीवन संघर्ष के लिये जरूरी खुराक खींच सकती है ।

यह कवि खंडित मूर्तियों के नगर का नागरिक तो अवश्य है और भ्रान्तियों से भरसक मुक्त भी, किन्तु उसकी यह निभ्र्रान्ति उसे सिनिकल नहीं बनाती, मारक व्यंग्योक्तियों के बावजूद। ना ही वह किसी परोपजीवी विचारधारा को ढुलवाने में ही अपनी सामाजिक संवेदना की कृतकार्यता का आश्वासन पा सकता है । अतिवादियो से सावधान वह जानता है कि ‘सत्य वह नहीं है जो हमने सुन कर माना है ,बल्कि वहीं है जिसका हम स्वंय आविष्कार करते हैं’। सृष्टि-रहस्य और मनुष्य-भाव के प्रति उसकी तीखी तड़प भरी बेचैनी ही उसके व्यंगास्त्र की धार को पैना बनाए रखती है-बिना किसी सरलीकरण के । विनोद कुमार शुक्ल के कविता-संग्रह ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ की तर्ज़ पर उसका भी अटूट विश्वास कि ‘सब कुछ कभी ख़त्म नहीं होगा ’ उसके लिए ‘अपने ही नये अस्तित्व का आविष्कार है’ । सचमुच ही ये कविताएँ अपनी उस ‘हुनरमंद लड़की’ की ही तरह ज़िन्दा रहने के ही नहीं, अर्थवान् ढंग से ज़िन्दा रहने के भी हुनर जानती हैं और जिन्हे कवि ने अपनी ही एक कविता में ‘गुमनाम लोग’ कहा है, वे ही उसकी आस्था को एक जोख़िम से निखरी हुई विश्वसनीय आस्था का रूप देते हैं

रमेश चंद्र शाह