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इसी देश में / प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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इसी देश में कृष्ण हुये हैं,
इसी देश में राम|
सबसे पहिले जाना जग ने,
इसी देश का नाम|

इसी देश में भीष्म सरीखे,
दृढ़ प्रतिग्य भी आये|
इसी देश में भागीरथ,
धरती पर गंगा लाये|
इसी देश में हुये कर्ण से,
धीर वीर और दानी|
इसी देश में हुये विदुर से,
वेद ब्यास से ग्यानी|
सत्य अहिंसा प्रेम सिखाना,
इसी देश का काम|

इसी देश में वीर शिवाजी,
सा चरित्र भी आया|
छत्रसाल जैसा योद्धा भी,
भारत ने उपजाया|
संरक्षण सम्मान सहित,
शरणागत को देता है|
जिसकी रक्षा में यह भारत,
जान लगा देता है|
इसी देश में मात पिता,
होते हैं तीरथ धाम|

इसी देश में हर बेटी,
माँ दुर्गा की अवतारी|
सावित्री सीता की प्रतिमा,
भारत की हर नारी|
वचन दिया तो उसे निभाने,
सिर भी कटवा देते|
भरत भूमि के वीर पुत्र हैं,
इस धरती के बेटे|
यहां भुगतना पड़ा दुष्ट को,
पापों का परिणाम|

इसी देश में कौशल्या सी,
मातायें जनमी हैं|
मातु यशोदा देवकी मां की,
यही कर्म भूमि है|
ध्रुव प्रहलाद सी दृढ़ प्रतिग्य,
भारत मां की संतानें|
महावीर गौतम गांधी भी,
जनमें भारत मां ने|
मनुज धर्म की रक्षा के हित,
हुये घोर संग्राम|

दया धर्म ईमान सचाई,
हमने कभी न छोड़ी|
प्रेम अहिंसा पर सेवा कि,
डोर हमेशा जोड़ी|
किसी पीठ पर धोखे से भी,
हमने किया न वार|
सदा सामने खड़े हुये हम,
लड़ने को तैयार|
भले हानियाँ लाख उठाईं,
हुये दुखद अंजाम|