भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ई त दिअना ह जिनगी के जरबे करी / धीरेन्द्र बहादुर 'चाँद'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ई त दिअना ह जिनगी के जरबे करी
कहियो मन के भरमवा त मेटबे करी

अब गन्हाइल ई पोखर बदले के बा
बा जे मछरी सड़लकी ऊ डहबे करी

हकवा हड़पे के आदत में जे बा पड़ल
लोगवा बहियाँ मरोड़ि हकवा लिहबे करी

बनि के अभिमन्यु व्यूहवा के तूड़े के बा
जिनगी के हर पहेली सुलझबे करी

नक्शा हालात के अब मेटावे के बा,
मोह टूटी त हर घात घटबे करी

जब अन्हरिया दरद बनि के टीसे लागी
भेद के हर मुखौटा खुलबे करी