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उजाला छिन न पाएगा / राजेन्द्र गौतम

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यह धुआँ
सच ही बहुत कड़वा --
घना काला
क्षितिज तक दीवार फिर भी
बन न पाएगा ।
 
सूरज की लाश दबी
चट्टान के नीचे
सोच यह मन में
ठठा कर रात हँसती है
सुन अँधेरी कोठरी की वृद्ध खाँसी को
आत्ममुग्धा-गर्विता यह
व्यंग्य कसती है

एक जाला-सा
समय की आँख में उतरा
पर उजाला सहज ही यों
छिन न पाएगा ।
 
संखिया कोई --
कुओं में डाल जाता है
हवा व्याकुल
गाँव भर की देह है नीली
दिशाएँ निःस्पन्द सब
बेहोश सीवाने
कुटिलता की गुँजलक
होती नहीं ढीली

पर गरुड़-से
भैरवी के पंख फैलेंगे
चुप्पियों के नाग का फन
तन न पाएगा ।