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उजाले-अंधियारे / सुरेश बरनवाल

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मेरे घर के कोने में
उजाला और अंधियारा
और उनकी बातें
उनका सहयोग
उनकी टकराहट
रहती थीं सदियों से
दोनों ने छिपा रखा था
अपना ठिकाना
और मुझे पता न पड़ता था।

वह दोनों
मेरे घर में बिखरे
मेरे सामानों के साथ
खेलते थे
आंख-मिचैली
धूप-छांव
पढ़ते थे मेरी किताबों को
और शास्त्रार्थ करते थे
तब
जब मैं घर में नहीं होता था।

पर एक दिन
उजाले ने
उस कोने से
अनायास ही
अपना मुंह निकाला
और मैं चौंक पड़ा था
फिर...
दोनों सहमे से खड़े थे / मेरे सामने
और मैं...
हतप्रभ / अवाक्
क्या करूं उनका
और कैसे यक़ीन करूं
उजाले-अंधियारे का
मेरे पुराने से घर के
एक कोने में रहना
जिसमें
या तो मैं रहता था
या मेरा पुराना सामान
सभी बिखरे-बिखरे से।

मैं निःशब्द
अपनी चारपाई पर जा लेटा था
और वे दोनों
सरक गए थे
फिर अपने-अपने कोनों में।

सदियों से ढोते अपने एकान्त से
छुटकारा पाने को शायद
एक दिन
मैंने स्वीकार लिया इनका साथ
इसके बाद
हम तीनों साथ-साथ हंसते-रोते
और अपनी बातें
एक-दूसरे को बताया करते थे।

मेरी डायरी में लिखी गई
मेरी निजी बातों को
उजाला कभी पढ़ लेता
तो अंधियारा उसे छिपा लेता।
हर शब्द के
अंधियारे और उजले पहलू का
कभी वह करने लगते अन्वेषण
और मैं हैरान हो सुना करता था।

यह सपना-सा तो था
कहानी-सी तो थी
परन्तु हक़ीक़त थी
जो मेरे घर के एक कोने में
घटित हो रही थी।
मैं खुश भी था
कि मैं अकेला तो नहीं।

एक दिन अंधियारे के चेहरे पर
घनी दाढ़ी निकल आई
उसका काला चेहरा
गंभीर दिखने लगा
और एकाएक लगने लगा वह
मेरे एक दोस्त की तरह
जो समाज का कथित पहरूआ था।

पर अंधियारा पहरूआ नहीं था
वह बुद्धिजीवी भी नहीं था
उसके चेहरे पर उगी दाढ़ी
उसके गांभीर्य का परिचायक भी नहीं थी
अब वह हमसे कुछ कटने लगा था
वह उदास-सा रहता था
और तकता रहता था आसमां को।
मैंने देख ली थी
उसकी आंखों की गहराईयों में
महत्त्वाकांछाओं की चमक।
मैं जानता था
कि उसने ऊंचाईयाँ देख ली हैं
और अब...
उसे मेरे घर का कोना
छोटा लगने लगा है
और उजाले का तथा मेरा साथ
बचकाना।

मैं समझ चुका था
उसे रोकना अब संभव नहीं...
मैंने उजाले को समझाया
उसने भी नियति को स्वीकार
अपनी सहमति दे दी।
और अंधियारा
हमसे विदा लेकर
आकाश में चला गया
दूर, बहुत दूर
जहाँ हमारी आवाज़ नहीं जानी थी
और न ही उसे दिखनी थी
उजाले के हिलते हाथ की उंगलियाँ।

आसमां को पाते ही
अंधियारे के शरीर का दायरा फैल गया
और पूरे आसमां पर
अब वही दिखने लगा था
आसमां पर अब
अंधेरे का साम्राज्य था।

सभी डरते थे अंधेरे से
हालांकि अंधियारा
किसी को डराता नहीं था
किसी को परेशां करने का
उसका कोई इरादा नहीं था
पर अंधियारे के साम्राज्य में
कुछ मानवों के पैर निकल आये थे
और उनके चेहरे पर
दाढ़ी की तरह स्वार्थ उग आया था
वे मानव
अंधियारे के साम्राज्य के दूत बन गए
और डराने लगे सभी को।
उन्होंने अंधियारे को उलझा लिया था
अपनी चिकनी बातों में।
और अंधियारा
अब उनसे मशविरा करने लगा था।

एक दिन वह दूत मेरे पास आए
अंधियारे के बढ़ते साम्राज्य के नाम पर
उन्होंने
मुझसे मेरा घर छिन लिया
और उजाले से उसका कोना।
हमने आवाज़ लगाई
फरियाद किया
परन्तु उन्होंने अंधियारों के चारों तरफ
एक क़िला बना दिया था
जिसकी दीवारों पर दूत बैठे थे
और वे रोक लेते थे आवाजों को।

उजाले को स्वीकार नहीं था यह सब
अंधियारे को सच्चाई बताने
एक दिन वह भी चला गया
और अंधियारे के चारों तरफ़ बने
किले की दीवार पर चढ़ गया
पर इन दूतों को
अंधेरे और अंधियारे के बीच
किसी का हस्तक्षेप पसन्द न था

उन दूतों ने
उजाले के टुकड़े-टुकड़े कर दिए
और उसे आसमां पर बिखेर दिया।
मैंने देखा
एकाएक बहुत तारे आसमां पर चमकने लगे
और एक बड़ा-सा चांद।
उजाला बंट गया था इनमें
और अंधेरे को हरा रहा था
उसके उजाले से अब
मेरा घर भी दिखने लगा था
और मेरे घर का कोना भी।

एक दिन अंधियारे ने भी
उजाले के टुकड़ों को देख लिया
उसे सच्चाई का अहसास होने लगा
उसे अपनी ही दीवारें क़ैद लगने लगीं
अब वह भी किले से निकल
खुले आसमां में निकल आया।

अब उजाला और अँधियारा
एक बार फिर मिल गए थे
कितना सुन्दर दृश्य था यह
कितना सुन्दर।
मैं धरती पर बैठ
इसे निहारा करता हूँ जब-तब
अंधियारा और उजाला
दोनों अब बतियाते हैं मुझसे
और मैं उन्हें
अपनी डायरी में लिखी
भविष्य के आशाओं की
सच्ची / झूठी कहानियाँ सुनाता हूँ।

किले में रहने वाले दूत
अब पृथ्वी पर रहने लगे हैं
उन्होंने मेरा घर
और उसका कोना
अभी तक मुझे नहीं दिया है
वहाँ सत्ता कि कुर्सियाँ रख दी गई हैं
और सुनता हूँ
वहाँ से आदेश निकलते हैं
और लोगों के घरों के कोने
साम्राज्य / धर्म / समाज / कानून के नाम पर
छिन लिए जाते हैं।