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उड़न खटोले आ ! / रमेश तैलंग

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उड़नखटोले , परियों के देश मुझे ले चल ।
चन्दा मामा पर छढ़कर मैं छू लूँगा बादल ।

सपनों की शहजादी लोरी वहाँ सुनाएगी ।
मंगल ग्रह की सैर अनोखी रोज़ कराएगी ।
झिलमिल-झिलमिल करते तारे पास बुलाएँगे ।
हँसी-ख़ुशी का मौसम होगा, गाने गाएँगे ।
वहाँ न लिखना-पढ़ना होगा, खाने-पीने को-
नए-नए पकवान मिलेंगे, मीठे-मीठे फल ।

जगमग-जगमग रातें होंगी, उजले-उजले दिन ।
रंग-बिरंगी धरती होगी, जादू से पल-छिन ।
दृश्य एक से एक मिलेंगे जो मन को भाते
ऊँचे पर्वत, बहती नदियाँ, सागर लहराते ।
वहाँ न टूटे छप्पर होंगे, झोपड़ियाँ टूटी
वहाँ बने होंगे सुन्दर से सुन्दर राजमहल ।

नक्षत्रों के देश घूम जब वापस आऊँगा ।
सैर-सपाटे की बातें माँ को बतलाऊँगा ।
रह जाएँगे चकित सभी यह वर्णन सुन-सुन कर ।
बा मज़ा आएगा ये सब बातें कह-कह कर ।
अंतरिक्ष जाने वालों में होगा मेरा नाम,
’गगारिन’ सा चमकूँगा मैं आज नहीं तो कल ।