भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  रंगोली
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार
Roman

उड़ी उड़ी सुवा ना, का बोली बोले वो / छत्तीसगढ़ी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

उड़ी उड़ी सुवा ना, का बोली बोले वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, तोर बोली बोले

लाली चनारिया मोहनी मुरतिया
देखत मन ला मोहे वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, का बोली बोले वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, तोर बोली बोले

गाँवे शहर मा तोर होथे बड़ाई वो, जा के डोंगरगढ़ मा बसे बम्लाई
दूसर रूपे मा शारदा कहाये वो, जाके शहर तैं हा मईहर बसाये

माथे मा टोकिया, सोन के अंगूठीया, दसों अंगुरिया मा सोहे वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, का बोली बोले वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, तोर बोली बोले

चंद्रहासिनी चंदरपुर मा बिराजे वो, हे महामाया रतनपुर मा साजे
डिंडेश्वरी तैं मल्हार मा कहाये वो, जा के जिंहा दाई सोना बरसाये

नवदिन नवरात जोत, बरत हे दिया ना, मईया के झूलना झूले वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, का बोली बोले वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, तोर बोली बोले

लाली चनारिया मोहनी मुरतिया, देखत मन ला मोहे वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, का बोली बोले वो
उड़ी उड़ी सुवा ना, तोर बोली बोले