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उदासी घेरे / सांध्य के ये गीत लो / यतींद्रनाथ राही

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वही शाम है
वही सबेरे
चारो ओर
उदासी घेरे।

जिस पर हाथ धरो
पत्थर है
बियावान सा
अपना घर है
भागम भाग शोरगुल
हलचल
पल-पल संशय
पग-पग पर छल
पकड़े हाथ सहारा किसका
घिरे आ रहे
निपट अँधेरे।
दाँव-पेंच हैं
अपने-अपने
धरती पाँव
गगन के सपने
कैसा अपना और पराया
सारा जग
माया है माया
फँसी जाल में
वही मछरिया
शेष सभी तो
नक्र घनेरे!

कर्म
श्वेत हो, चाहे काला
तारनहार राम की माला
किससे
क्या लेना देना है
अपनी नाव
स्वयं खेना है
आज यहाँ
कल कहाँ न जाने
सारे घर तो
रैन बसेरे।