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उदास-उदास-सी सूरत हुई यूँ ही तो नहीं / दरवेश भारती

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उदास-उदास-सी सूरत हुई यूँ ही तो नहीं
कि उनकी आँखों में आयी नमी यूँ ही तो नहीं

कोई तो हादिसा गुज़रा है ज़िन्दगी में ज़रूर
ये ग़म, ये रंज, ये अफ़्सुर्दगी यूँ ही तो नहीं

गुज़र रही है जो हम पर हमीं समझते हैं
कि अपने हाल पे आयी हँसी यूँ ही तो नहीं

ज़रूर अँधेरों ने खुद को मिटा लिया होगा
हर एक सिम्त हुई रौशनी यूँ ही तो नहीं

वो आ रहे हैं रिआया को ख़ूब बहकाकर
कि उनके चेह्रे पे छायी हँसी यूँ ही तो नहीं

न हाल पूछो चमन के निगाहबानों का
यहाँ हरेक कली अधखिली यूँ ही तो नहीं

हैं मेह्रबानियाँ ये हुक्मरानों की 'दरवेश'
दिले-अवाम में ये बेकली यूँ ही तो नहीं