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उदास हूँ मैं / शशि काण्डपाल

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पंखों का निकल आना,
डैनों का जम जाना,
चिड़िया का अपने नन्हे को ,
घोंसले में ना पाना...
बेतहाशा चहचहाना और इस डाल से उस डाल
परेशान फड़फड़ाना,
लौट-लौट खाली घोंसला देखना औऱ
अकेली बैठ चारों तरफ गर्दन घुमाना...
उदास हूँ मैं

कोई चिड़िया को समझाए,
अब अनंत आकाश बाहें फैलाये,
छोटे से पर तोलने को उकसाये,
कल उसका भी हो अपना आशियाँ,
और वो भी ऐसे ही दाने चुन-चुन लाये....
नन्ही मुस्काने करें मजबूर,
लौट आने को जहाँ के किसी भी कोने से,
और देखते ही वो मुस्कान,
हर दर्द छूमंतर हो जाए।।
लेकिन उदास हूँ मैं

सृष्टि की नियति और प्रकृति विहंगम,
मुक्त आकाश और उसकी ऊचाइयां...
नापनी ही होंगी उसे अपने बल पर,
और देना ही होगा वो साहस,
ऊँचे उड़ते और दूर जाते
हृदय के टुकड़ों की यादों को....
कहीं बहुत खुश, कहीं बहुत उदास हूँ मैं,
आखिर माँ हूँ मैं...