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उन्मुक्त / मीना चोपड़ा

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कलम ने उठकर
चुपके से कोरे काग़ज़ से कुछ कहा

और मैं स्याही बनकर बह चली
           मधुर स्वछ्न्द गीत गुनगुनाती,
                     उड़ते पत्तों की नसों में लहलहाती!

उल्लसित जोशीले से
ये चल पड़े हवाओं पर
अपनी कहानियाँ लिखने।

           सितारों की धूल
                      इन्हें सहलाती रही।

कलम मन ही मन
             मुस्कुराती रही
                       गीत गाती रही।