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उफ़ मैं इतना भी कर नहीं पाई / सिया सचदेव

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उफ़ मैं इतना भी कर नहीं पाई
प्यार में तेरे मर नहीं पाई
 
सबका ग़म बांटती रही अब तक
अपने ग़म से उबर नहीं पाई
 
जिंदगी तुझसे हूँ मैं शर्मिंदा
रंग जो तुझ में भर नहीं पाई
 
मैंने इक इक शय संवारी हैं
सिर्फ किस्मत संवर नहीं पाई
 
मैंने उल्फत निभाई हैं तुझसे
तुमसे लेकिन वफ़ा नहीं पाई
 
कितनी मज़बूत है ये आस मेरी
टूट कर भी बिखर नहीं पाई
 
मैं हूँ इक ऐसी सुबह की भूली
शाम को भी जो घर नहीं आई
 
कह तो ली हैं ग़ज़ल सिया तुने
रंग शेरो में भर नहीं पाई